Dreams

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Sunday, June 26, 2016

फिलहाल मैंने जीना सीख लिया

ख्वाइशों की कश्ती लिए
                      जाने कब से चले थे हम
मीलों दूर किसी अपने के साथ
                       सपनों की नयी बस्ती बसाने चले थे हम
फटते हुए बादबानों को ना जाने कितनी ही बार सी लिया
                        ऐ ज़िन्दगी फिलहाल मैंने जीना सीख लिया

परायों को अपना बनाने में
                        कई अपने छूट गए
एक को मनाने की दौड़ में
                         कई सौ रूठ गए
इमरत की तलाश में, न जाने कितनी बार ये ज़हर पी लिया
                ऐ ज़िन्दगी फिलहाल मैंने जीना सीख लिया

रातें कई बीती
                   उन सितारों की आस में
मैखानों को घर बनाया,
                   उसकी एक झलक की प्यास में
आसमान छूने की चाहत में इस ज़मीन से नाता छूट गया
                   ऐ ज़िन्दगी फिलहाल मैंने जीना सीख लिया

उजाड़ना ही था तो बसाया क्यों
                   बार बार, बार बार आरज़ुओं को जगाया क्यों
सुकून की खोज में सारी नींद गवां बैठे
                    नादान थे हम की मझधार को किनारा समझ बैठे
ना कोई चाँद थी, ना कोई चकोर
                    आवाज़ दिल टूटने की थी, सूना बस उसने शोर
ना था हमपे उसे कोई हक़
                     खुद ही हो गए थे उसके बिना कोई शक
गिर, पड़ , उठ, चल, आखिर मैं दौड़ने लग गया
                      ऐ ज़िन्दगी फिलहाल मैंने जीना सीख लिया

बहक कर कई बार तेरे किस्से सुनाता  हूँ
                      सिगरेट की शमा की आड़ में खुद को जलाता हूँ
ज़माने को हसाती ये आँखें नम हैं
                      इस हंसी के मुखौटे के पीछे छुपे कई गम हैं
कुरेदे हुए इन ज़ख्मों पे आखिर मैंने मरहम लगा लिया
                      ऐ ज़िन्दगी फिलहाल मैंने जीना सीख लिया

अर्सों बाद इन आँखों को एक नयी मंज़िल दिखी है
                      फिर से इस कलम ने एक नयी बंद लिखी है
ख्वाइशों के परिंदे ने भरी है एक नयी उड़ान
                      जाना पहचाना सा है रास्ता पर अब की बार है एक नया मुकाम
बस ज़िंदा रहना किस्मत नहीं है और, आज फिर जी भर चीख़ लिया
                      ऐ ज़िन्दगी फिलहाल मैंने जीना सीख लिया

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